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मध्यकालीन बिहार: शेरशाह सूरी एवं उसका प्रशासन

By ExamAtlas · 29/8/2026

मध्यकालीन बिहार: शेरशाह सूरी एवं उसका प्रशासन

शेरशाह से प्रश्न बिहार की परीक्षा में लगभग निश्चित है, क्योंकि वे इसी राज्य से थे और उनका मक़बरा सासाराम में है। प्रश्न प्रायः उनके सुधारों पर आते हैं, इसलिए सड़क, मुद्रा, भूमि और डाक — इन चार क्षेत्रों को अलग-अलग याद कीजिए।

सत्ता तक का रास्ता

शेरशाह का मूल नाम फ़रीद ख़ाँ था और उन्हें शेर ख़ाँ की उपाधि तब मिली जब उन्होंने अकेले एक शेर को मारा। वे सासाराम के एक जागीरदार परिवार से थे और उन्होंने बिहार से ही अपनी शक्ति बढ़ाई।

  • चौसा का युद्ध 1539 में हुआ, जिसमें उन्होंने हुमायूँ को हराया।
  • कन्नौज का युद्ध 1540 में हुआ, जिसके बाद हुमायूँ को भारत छोड़ना पड़ा।
  • उनका शासन 1540 से 1545 तक, यानी केवल पाँच वर्ष रहा।
  • 1545 में कालिंजर के क़िले की घेराबंदी के दौरान उनकी मृत्यु हुई।

पाँच वर्ष का शासन बहुत छोटा होता है, फिर भी उन्होंने जो व्यवस्था बनाई वह इतनी ठोस थी कि मुगलों ने उसे अपनाकर आगे बढ़ाया। यही उनकी असली उपलब्धि है।

प्रशासनिक सुधार

क्षेत्रसुधार
सड़कसड़क-ए-आज़म, जो बंगाल से पेशावर तक जाती थी
मुद्राचाँदी का रुपया और ताँबे का दाम
भूमिपैमाइश के बाद कर तय; पट्टा और कबूलियत
डाकघोड़ों द्वारा तेज़ डाक व्यवस्था
सराययात्रियों के लिए सड़कों पर सरायें
सैन्यसैनिकों का हुलिया और घोड़ों का दाग

सड़क-ए-आज़म को अंग्रेज़ों ने आगे चलकर ग्रैंड ट्रंक रोड नाम दिया और वह आज भी उपयोग में है। रुपया शब्द उन्हीं के चलाए चाँदी के सिक्के से आया है और आज भी हमारी मुद्रा का नाम वही है।

भूमि व्यवस्था में उन्होंने पट्टा यानी किसान को दिया जाने वाला अधिकार पत्र और कबूलियत यानी किसान की स्वीकृति दोनों शुरू किए। इससे किसान को पता रहता था कि उसे कितना देना है और अधिकारी मनमानी नहीं कर सकते थे।

✗ शेरशाह ने केवल सड़कें बनवाईं और उनका प्रशासन में कोई योगदान नहीं था  |  ✓ उन्होंने मुद्रा, भूमि, डाक और सैन्य व्यवस्था में भी ऐसे सुधार किए जिन्हें बाद में मुगलों ने अपनाया

उनके सुधार टिके क्यों

इसका कारण यह है कि उनके सुधार किसी एक व्यक्ति पर नहीं, व्यवस्था पर टिके थे। सड़क, सराय, डाक और पैमाइश — ये सब ऐसी संरचनाएँ थीं जो शासक बदलने पर भी काम करती रहीं।

दूसरा कारण यह है कि उनके सुधारों का सीधा लाभ किसान और व्यापारी को मिलता था। सड़क से व्यापार सस्ता हुआ, सराय से यात्रा सुरक्षित हुई, और पट्टा-कबूलियत से किसान को निश्चितता मिली। इसीलिए अकबर की भूमि व्यवस्था भी काफ़ी हद तक इन्हीं सिद्धांतों पर बनी।

सासाराम और जो शेष है

शेरशाह का मक़बरा सासाराम में है और वह एक तालाब के बीच बना है, जिससे वह पानी पर तैरता हुआ दिखता है। इसे भारतीय और इस्लामी स्थापत्य के मेल का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

बिहार के लिए यह अध्याय इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह दिखाता है कि राज्य केवल प्राचीन काल में ही नहीं, मध्यकाल में भी राष्ट्रीय इतिहास के केंद्र में रहा। सासाराम, चौसा और रोहतासगढ़ — तीनों स्थल बिहार में हैं और प्रश्न में आ चुके हैं।

शेरशाह के सुधारों को चार शब्दों में बाँधिए — सड़क, सिक्का, ज़मीन और डाक। हर शब्द के साथ एक ठोस विवरण जोड़ लीजिए, फिर इस अध्याय से कोई प्रश्न छूटेगा नहीं।

TRE संकेत: सड़क-ए-आज़म और रुपया सबसे अधिक पूछे जाते हैं। पट्टा और कबूलियत भी तयशुदा हैं। चौसा 1539 और कन्नौज 1540 तथा सासाराम का मक़बरा भी सीधे आए हैं।

60 सेकंड का रिवीजन

  • शेरशाह का मूल नाम फ़रीद ख़ाँ था।
  • उन्होंने 1539 में चौसा और 1540 में कन्नौज में हुमायूँ को हराया।
  • उनका शासन केवल पाँच वर्ष का रहा।
  • सड़क-ए-आज़म बंगाल से पेशावर तक जाती थी।
  • उन्होंने चाँदी का रुपया और ताँबे का दाम चलाया।
  • पट्टा और कबूलियत से किसान को निश्चितता मिली।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शेरशाह के सुधार उनके बाद भी क्यों चलते रहे?

क्योंकि वे किसी व्यक्ति पर नहीं, संरचना पर टिके थे। सड़क, सराय, डाक व्यवस्था और भूमि की पैमाइश — ये सब ऐसी चीज़ें थीं जो शासक बदलने पर भी काम करती रहीं। इसके अलावा उनका सीधा लाभ किसान और व्यापारी को मिलता था, इसलिए उन्हें बनाए रखने में सबका हित था।

पट्टा और कबूलियत क्या थे?

पट्टा वह अधिकार पत्र था जो किसान को दिया जाता था और जिसमें उसकी भूमि तथा देय कर का विवरण होता था। कबूलियत वह स्वीकृति पत्र था जिसमें किसान उतना कर देना स्वीकार करता था। दोनों मिलकर किसान को निश्चितता देते थे और अधिकारियों की मनमानी रोकते थे।

रुपया शब्द कहाँ से आया?

शेरशाह द्वारा चलाए गए चाँदी के सिक्के से, जिसका नाम रुपया था। उन्होंने ताँबे का सिक्का दाम भी चलाया। यह मुद्रा व्यवस्था इतनी व्यावहारिक सिद्ध हुई कि मुगलों ने भी इसे अपनाया, और आज भी भारत की मुद्रा का नाम वही है।

शेरशाह का बिहार से क्या संबंध है?

वे सासाराम के एक जागीरदार परिवार से थे और उन्होंने अपनी शक्ति का आधार बिहार से ही बनाया। चौसा का युद्ध भी बिहार में हुआ और रोहतासगढ़ का क़िला उनके नियंत्रण में रहा। उनका प्रसिद्ध मक़बरा सासाराम में एक तालाब के बीच बना है।

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