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सिंधु घाटी सभ्यता

By ExamAtlas · 10/9/2026

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु या हड़प्पा सभ्यता (परिपक्व चरण लगभग 2600 से 1900 ईसा पूर्व) उपमहाद्वीप की पहली नगरीय सभ्यता थी, जो लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर में वर्तमान पाकिस्तान, उत्तर-पश्चिम भारत और अफगानिस्तान तक फैली थी | इसकी पहचान हैं - जाल जैसी नगर योजना, मानक पकी ईंटें, जल निकासी, तौल की इकाइयाँ और अब तक अपठित लिपि |

खोज, चरण और विस्तार

हड़प्पा का उत्खनन 1921 में दयाराम साहनी ने और मोहनजोदड़ो का 1922 में आर. डी. बनर्जी ने किया, दोनों भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल के अधीन | लिपि पढ़ी न जा सकने के कारण इस सभ्यता को आद्य-ऐतिहासिक (protohistoric) कहा जाता है |

चरणअनुमानित तिथिस्वरूप
प्रारंभिक हड़प्पालगभग 3300-2600 ईसा पूर्वक्षेत्रीय संस्कृतियाँ - कोटदीजी, आमरी, सोथी-सिसवाल; किलेबंदी का आरंभ
परिपक्व हड़प्पालगभग 2600-1900 ईसा पूर्वपूर्ण नगरीकरण, लिपि, मुहरें, मानक बाट, दूरस्थ व्यापार
उत्तर हड़प्पालगभग 1900-1300 ईसा पूर्वनगरीकरण का ह्रास, बस्तियाँ पूर्व की ओर हरियाणा और ऊपरी गंगा मैदान में

चार सीमावर्ती स्थल एक साथ याद करने योग्य हैं - पश्चिम में सुत्कागेंडोर (बलूचिस्तान), पूर्व में आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश), उत्तर में मांडा (जम्मू, चिनाब पर) और दक्षिण में दैमाबाद (महाराष्ट्र, प्रवरा नदी पर) | सबसे अधिक स्थल आज के भारत में हैं, और हरियाणा का राखीगढ़ी भारत का सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल है |

नगर योजना और स्थापत्य

सामान्य परिपक्व हड़प्पा नगर दो टीलों का था - पश्चिम में ऊँचा दुर्ग (citadel) जिसमें सार्वजनिक भवन थे, और पूर्व में निचला नगर जिसमें आवासीय खंड थे | सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं, घरों के द्वार मुख्य सड़क पर नहीं बल्कि गलियों में खुलते थे, और हर घर का स्नानघर ढकी हुई नाली से जुड़ा था | पकी ईंटें एक निश्चित अनुपात में बनती थीं, जो स्वयं केंद्रीय मानकीकरण का प्रमाण है |

हड़प्पा ईंट अनुपात = 1 : 2 : 4 (मोटाई : चौड़ाई : लंबाई)

स्थलनदीप्रमुख खोज
मोहनजोदड़ोसिंधुविशाल स्नानागार, विशाल अन्नागार, काँस्य नर्तकी, पशुपति मुहर, पुरोहित राजा
हड़प्पारावीपंक्तिबद्ध छह अन्नागार, श्रमिक आवास, कब्रिस्तान R-37, पाषाण नर्तक मूर्ति
कालीबंगा (राजस्थान)घग्घरजुता हुआ खेत, अग्निकुंड, हल रेखाएँ, भूकंप के प्रमाण
लोथल (गुजरात)भोगावोगोदीबाड़ा, चावल की भूसी, अग्निकुंड, युगल समाधि, मनका कारखाना
धौलावीरा (गुजरात)मनहर और मनसरतीन भागों वाला नगर, विशाल जलाशय, साइनबोर्ड अभिलेख; UNESCO स्थल
राखीगढ़ी (हरियाणा)दृषद्वतीभारत का सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल
बनावली (हरियाणा)घग्घरअरीय और जालनुमा दोनों सड़कें, जौ, खिलौना हल
चन्हूदड़ो (सिंध)सिंधुएकमात्र बड़ा स्थल जिसमें दुर्ग नहीं; मनका और मुहर निर्माण
सुरकोटदा (गुजरात)-एकमात्र स्थल जहाँ घोड़े की अस्थियाँ प्रमाणित हैं

अर्थव्यवस्था, समाज और धर्म

अर्थव्यवस्था का आधार कृषि (गेहूँ, जौ, कपास - यूनानियों ने सिंध के नाम पर कपास को सिंडन कहा - और चावल केवल लोथल तथा रंगपुर में), शिल्प उत्पादन और व्यापार था | मेसोपोटामिया से व्यापार वहाँ मिली हड़प्पा मुहरों और मेलुहा (Meluha) के उल्लेखों से प्रमाणित होता है | बाट 16 के गुणकों में थे | सिक्के नहीं थे - व्यापार वस्तु विनिमय से होता था |

  • मुहरें प्रायः सेलखड़ी की, वर्गाकार, जिन पर पशु और छोटा अभिलेख होता था; एकश्रृंगी पशु सबसे आम है
  • लिपि चित्रात्मक थी और बौस्ट्रोफेदन शैली में लिखी जाती थी - पहली पंक्ति दाएँ से बाएँ, अगली बाएँ से दाएँ
  • कोई मंदिर निश्चित रूप से पहचाना नहीं गया; धर्म का अनुमान मुहरों और मूर्तियों से है
  • मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ, पशुपति मुहर, तथा पीपल और कूबड़दार बैल की पूजा
  • समाधियाँ प्रायः उत्तर-दक्षिण दिशा में; कालीबंगा में प्रतीकात्मक और लोथल में कुछ युगल समाधियाँ

✗ हड़प्पावासी लोहा जानते थे और सिक्के चलाते थे  |  ✓ हड़प्पावासी ताँबा और काँसा प्रयोग करते थे; लोहा और सिक्के अज्ञात थे

पतन

कोई एक कारण सर्वमान्य नहीं है | मुख्य परिकल्पनाएँ हैं - जलवायु परिवर्तन और बढ़ती शुष्कता, घग्घर-हाकड़ा नदी तंत्र का सूखना या मार्ग बदलना, भूगर्भीय हलचल और बाढ़ (मोहनजोदड़ो में बार-बार बाढ़ की परतें मिलती हैं), ईंट पकाने से वनों का विनाश और पारिस्थितिक दबाव, तथा मेसोपोटामिया से व्यापार का टूटना | मोर्टिमर व्हीलर का आर्य आक्रमण सिद्धांत, जो मोहनजोदड़ो के बिखरे कंकालों पर आधारित था, अब लगभग अस्वीकृत है | वास्तव में सभ्यता समाप्त नहीं हुई - नगरीकरण समाप्त हुआ और उत्तर हड़प्पा गाँव पूर्व की ओर बसते रहे |

संबंध: हड़प्पा का पतन वैदिक काल की निरंतरता की बहस और घग्घर-हाकड़ा तथा सिंधु अपवाह तंत्र के भूगोल से सीधे जुड़ा है | मेसोपोटामिया से व्यापार आगे चलकर उत्तर-मौर्य काल के भारत-रोम व्यापार से जुड़ता है, और धौलावीरा तथा लोथल कला-संस्कृति में UNESCO धरोहर स्थल के रूप में लौटते हैं |

परीक्षा संकेत: लगभग हर वर्ष एक से दो प्रश्न | प्रवृत्ति 'विशाल स्नानागार कहाँ है' से हटकर हड़प्पा समाज, तकनीक और नई उत्खनन खोजों पर कथन आधारित प्रश्नों की ओर बढ़ी है | अधिक अंक देने वाली जोड़ियाँ - लोथल-गोदीबाड़ा, कालीबंगा-जुता खेत, धौलावीरा-जलाशय, चन्हूदड़ो-दुर्ग नहीं, सुरकोटदा-घोड़े की अस्थि | जाल - यह मान लेना कि हर स्थल पर दुर्ग था, चावल हर जगह उगता था, या लिपि पढ़ ली गई है | धौलावीरा 2021 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में आया, यह भी याद रखो |

FAQ

सिंधु सभ्यता को आद्य-ऐतिहासिक क्यों कहते हैं?

क्योंकि हड़प्पावासियों के पास लेखन था पर वह लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी | प्राक्-इतिहास का अर्थ है लेखन का पूर्ण अभाव और इतिहास का अर्थ है पढ़े जा सकने वाले अभिलेख | लगभग 400 चिह्नों वाली हड़प्पा लिपि अपठित है, इसलिए यह काल दोनों के बीच आता है |

आज भारत में कौन-कौन से हड़प्पा स्थल हैं?

हरियाणा में राखीगढ़ी, बनावली और भिरड़ाना, राजस्थान में कालीबंगा, गुजरात में लोथल, धौलावीरा, सुरकोटदा और रंगपुर, उत्तर प्रदेश में आलमगीरपुर, जम्मू में मांडा तथा महाराष्ट्र में दैमाबाद | उत्खनित हड़प्पा स्थलों की संख्या भारत में पाकिस्तान से अधिक है |

विशाल स्नानागार हड़प्पा समाज के बारे में क्या बताता है?

मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार लगभग 12 गुणा 7 मीटर का है, जिसमें डामर की परत और बगल में कक्ष हैं | यह संगठित सार्वजनिक निर्माण और संभवतः अनुष्ठानिक स्नान की ओर संकेत करता है | इससे जल-रोधन की तकनीकी दक्षता और साझा सुविधाएँ बनाने-चलाने वाली नागरिक सत्ता दोनों दिखते हैं |

60 सेकंड में दोहराव

  • परिपक्व चरण लगभग 2600-1900 ईसा पूर्व; हड़प्पा 1921 (साहनी), मोहनजोदड़ो 1922 (बनर्जी) |
  • सीमाएँ - पश्चिम सुत्कागेंडोर, पूर्व आलमगीरपुर, उत्तर मांडा, दक्षिण दैमाबाद |
  • जालनुमा योजना, दुर्ग और निचला नगर, 1:2:4 ईंट, ढकी नालियाँ, कोई मंदिर नहीं |
  • लोथल गोदीबाड़ा, कालीबंगा जुता खेत, धौलावीरा जलाशय, चन्हूदड़ो में दुर्ग नहीं |
  • ताँबा और काँसा पर लोहा नहीं; वस्तु विनिमय पर सिक्के नहीं; मेलुहा व्यापार |
  • पतन एक आक्रमण से नहीं, अनेक कारणों से हुआ नगरीकरण का ह्रास था |

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